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Thursday, April 26, 2018

UK में बिकने के लिए आई दुनिया की सबसे महंगी नंबर प्लेट, कीमत 132 करोड़

UK में बिकने के लिए आई दुनिया की सबसे महंगी नंबर प्लेट, कीमत 132 करोड़



अबतक यह रिकॉर्ड दुबई में बिकी डी5 प्लेट के नाम दर्ज है जो 67 करोड़ रुपए में बिकी थी और खरीददार भारत के बलविंदर साहनी हैं. टैप कर जानें क्या है वो नंबर?









फिलहाल ये रिकार्फ 2016 में 67 करोड़ रुपए की D5 नंबरप्लेट का है









भारत में अगर कोई व्यक्ति 1 लाख या 5 लाख की नंबरप्लेट खरीदे तो उसे बड़ी बात समझा जाता है. अपनी कार में बेहतरीन नंबर वाली प्लेट के लिए कई लोग इससे भी ज़्यादा कीमत खर्च करते हैं. लेकिन जब विदेशों में कार की वीआईपी नंबरप्लेट की बात आती है












तो यह रकम इतनी हो जाती है जितना हम खर्चने का सोच भी नहीं सकते. यूनाइटेड किंगडम में आधिकारिक रूप से ‘F1’ नंबर को बेचने के लिए पेश किया गया है जिसकी कीमत 132 करोड़ रुपए रखी गई है. F1 नंबर अब शान की बात हो चुका है और इसे मर्सडीज़-मैक्लेरेन एसएलआर, कस्टम रेन्ज रोवर और बुगाटी वेरॉन जैसी कारों पर लगाया गया है






इससे पहले 2008 में 4 करोड़ रुपए की यह प्लेट्स बिकी थी जो 1904 से ऐक्सेस सिटी काउंसिल के मालिकाना हक में थीं.











F1 नंबर की इस प्लेट के फिलहाल मालिकाना हक रखने वाले अफज़ल खान कारों को कस्टमाइज़ करने की स्पेशलाइज़्ड फर्म खान डिज़ाइन के मालिक हैं. फॉर्मुला वन का छोटा नाम F1 होता है और यूनाइटेड किंगडम के साथ दुनियाभर में इस नंबर को काफी पसंद किया जाता है.






इसके साथ ही इसके इतने महंगे होने का कारण इसका सिर्फ 2 अंकों में होना है. अगर ये बिक जाती है तो ये दुनिया की सबसे महंगे दाम पर बिकने वाली नंबरप्लेट हो जाएगी. अबतक यह रिकॉर्ड दुबई में बिकी डी5 प्लेट के नाम दर्ज है जो 67 करोड़ रुपए में बिकी थी और इसके खरीददार भारत के बलविंदर साहनी हैं. 












इस सबके बाद भी भारत में कस्टमाइज़ नंबरप्लेट का कोई प्रावधान नहीं है, यहां आप सीधे आरटीओ से स्पेशल नंबर वाली कोई भी प्लेट खरीद सकते हैं. दुपहिया वाहनों के लिए 5,000-50,000 रुपए में रेन्ज में नंबर उपलब्ध हैं, वहीं चार पहिया वाहनों के लिए ये रेन्ज 15,000 रुपए से 1 लाख रुपए के तक है.







 अगर दो खरीददार अधिकतम राशी देने के तैयार हैं तो ऐसी स्थिति में बोली लगाई जाती है. हमें लगता है कि सभी देशों की तरह भारत में भी कस्टमाइज़ नंबर्स दिए जाने चाहिए जिसमें F1 जैसे ही अल्फान्यूमैरिक नंबर्स दिए जाने चाहिए जैसा कि विदेशों में लंबे समय से किया जा रहा है.



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28 गेंदों में 8 रन पर गिरे इतने विकेट, हैदराबाद ने मुंबई की 'दुनिया हिला दी'

28 गेंदों में 8 रन पर गिरे इतने विकेट, हैदराबाद ने मुंबई की 'दुनिया हिला दी'



मुंबई इंडियन्स का थीम सॉन्ग 'दुनिया हिला देंगे' मंगलवार को सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ उलट साबित हुआ। 








टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी हैदराबाद की पूरी टीम 18.4 ओवर में महज 118 रन पर ढेर हो गई।








मुंबई इंडियन्स का थीम सॉन्ग 'दुनिया हिला देंगे' मंगलवार को सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ उलट साबित हुआ। टॉस हारकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी हैदराबाद की पूरी टीम 18.4 ओवर में महज 118 रन पर ढेर हो गई।











पहली पारी के बाद ऐसा लग रहा था कि मुंबई आसानी से लक्ष्य को हासिल कर जीत की राह पर लौट आएगी लेकिन सनराइजर्स के गेंदबाजों ने ऐसा कहर ढाया कि मुंबई की टीम 18.5 ओवर में महज 87 रन पर ढेर हो गई। मुंबई को दो बल्लेबाज सूर्यकुमार यादव(34) और हार्दिक पंड्या(24) ही दो अंक के आंकड़े तक पहुंच सके। 






मुंबई ने लक्ष्य का पीछा करते हुए 13 ओवर में 4 विकेट खोकर 73 रन बना लिए थे। एक छोर पर फॉर्म में चल रहे सूर्य कुमार यादव(32) खेल रहे थे वहीं दूसरी तरफ केरन पोलार्ड(9) थे। मुंबई को जीत के लिए 42 गेंद में 46 रन बनाने थे। मैच एक तरह से मुंबई की पकड़ में था।










लेकिन इसके बाद सनराइजर्स के कप्तान ने गेंद राशिद खान के हाथों में थमा दी। राशिद ने कप्तान को निराश नही किया और पहली ही गेंद पर पोलार्ड को स्लिप पर खड़े शिखर धवन के हाथों कैच कराकर पवेलियन वापस भेज दिया। 





इसके बाद अगले ओवर में विलियमसन ने गेंद बासिल थंपी के हाथों में थमा दी। थंपी ने भी शानदार गेंदबाजी करते हुए ओवर की पांचवीं गेंद पर एक तरफ मोर्चा संभाले सूर्यकुमार यादव को राशिद खान के हाथों डीप स्क्वैर पर लपकवा दिया और मुंबई को परेशानी में डाल दिया। 6 विकेट गंवाने के बाद मुंबई को 30 गेंद में 42 रन बनाने थे और दो नए बल्लेबाज पिच पर थे। ऐसे में विलियमसन ने बड़ा कदम उठाते हुए गेंद राशिद की जगह सिद्धार्थ कौल के हाथों में सौंप दी। 












पारी का 16वां ओवर करने आए कौल ने दूसरी ही गेंद पर मिचेल मैक्लेघन को एलबीडब्ल्यू कर पवेलियन वापस भेज दिया। इसके बाद बैटिंग करने आए मयंक मार्कंडे भी 2 गेंद पर 1 रन बनाकर ओवर की आखिरी गेंद पर एलबीडब्ल्यू करार दिए गए। ऐसे में टीम को दबाव में देख एक बार फिर कप्तान ने गेंद राशिद के हाथों में सौंप दी। 17वें ओवर में राशिद के सामने हार्दिक जैसा विस्फोटक बल्लेबाज था लेकिन उन्होंने मेडन ओवर डालकर मुंबई को और दवाब में ला दिया। ऐसे में मुंबई के सामने जीत के लिए 18 गेंद में 39 रन बनाने की स्थिति आ गई और उसके पास केवल दो विकेट बाकी थे। ऐसे में 18वें ओवर की पहली गेंद खेलने बुमराह आए और कौल की गेंद पर लपके जाने से बच गए। इसके बाद कौल ने एक बार फिर शानदार गेंदबाजी करते हुए हार्दिक को शॉट्स खेलने का मौका नहीं दिया। चौथी गेंद पर कौल ने हार्दिक को थर्ड मैन बाउंड्री पर थंपी के हाथों कैच कराकर मुंबई के लिए मैच एक तरह से खत्म कर दिया। हार्दिक हैदराबाद की कसी हुई गेंदबाजी के आगे 19 गेंद में 3 रन बना सके।






 हैदराबाद के गेंदबाजों के सामने मुंबई के बल्लेबाजों की ये स्थिति हो गई कि वो 28 गेंद में 5 विकेट खोकर केवल 8 रन बना सके। और मैच उनके हाथ से फिसल गया। मुस्तफिजुर रहमान के रूप में बासिल थंपी ने आखिरी विकेट लेकर हैदराबाद को यादगार जीत दिला दी। इससे पहले हैदराबाद वानखेड़े में मुंबई से कोई मैच नहीं जीत सका था। 



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फीचर फोन की दुनिया में JioPhone बना नंबर वन, अबतक कुल चार करोड़ फोन बिके

फीचर फोन की दुनिया में JioPhone बना नंबर वन, अबतक कुल चार करोड़ फोन बिके



जियो के रेवेन्यू में जियोफोन की भूमिका को स्टडी करते हुए बताया गया है कि अब तक कुल चार करोड़ जियोफोन की बिक्री हो चुकी है.













रिलायंस जियो ने दो साल से भी कम वक्त में देश की तीन टॉप टेलीकॉम ऑपरेटर्स के बीच अपनी जगह बना ली है. Counterpoint की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 के पहले तिमाही में जियो फोन फीचर फोन के सेगमेंट में नंबर वन बन गया है.










इस सेगमेंट में रिलायंस जियो 35.8% मार्केट शेयर के साथ नंबर वन बन गया है. जियो के रेवेन्यू में जियोफोन की भूमिका को स्टडी करते हुए बताया गया है कि अब तक कुल चार करोड़ जियोफोन की बिक्री हो चुकी है.














टेलीकॉम इंडस्ट्री पर क्रेडिट सूइस के एक सर्वे में बताया गया है कि हाल की मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि साल 2018 की जनवरी-मार्च तिमाही में जियोफोन की फीचर फोन सेगमेंट में 36 फीसदी बाजार हिस्सेदारी रही.

रिसर्च में कहा गया है, "इस तिमाही में जियोफोन की बिक्री करीब 2.1 करोड़ रही, इस हिसाब से हर माह 70 लाख जियोफोन की बिक्री हुई."








रिपोर्ट में कहा गया है, "नतीजों से यह पता चलता है कि जियो अब शुरुआती खरीद की अवधि को पार कर चुका है और लोगों ने इसे अच्छी तरह स्वीकार किया है. बहुत जल्द यह दूसरी कंपनियों के ग्राहकों को अपनी ओर खींचेगी और अन्य फीचर फोन की बाजार हिस्सेदारी में सेंध लगाएगी. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सेगमेंट में जियो किस तरह के डेटा एक्सपीरियंस यूजर्स को देता है."











रिपोर्ट में कहा गया है कि जियो ने स्मार्टफोन सेगमेंट में लगातार प्रति फोन 10 जीबी/प्रति महीने से अधिक का डेटा खपत दर्ज किया है. सर्वे में कहा गया, "हमें आश्चर्य होगा, अगर फीचर फोन यूजर्स भी स्मार्टफोन यूजर्स जितना ही डेटा की खपत करेंगे."










आपको बता दें जियो फोन को रिलायंस जियो ने साल जुलाई 2017 में लॉन्च किया था.















इस स्मार्टफोन को खरीदने के लिए 1500 रुपये ग्राहक को देने पड़ते हैं जो 36 महीनों के बाद वापस कर दिए जाते हैं.









 फीचर फोन सेगमेंट में ये पहला 4G VoLTE फोन है. इस पर ग्राहक यूट्यूब, फेसबुक, गूगल सर्च का इस्तेमाल कर सकता है.




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भारत में मिली दुनिया की सबसे लंबी गुफा की रहस्यमयी दुनिया

भारत में मिली दुनिया की सबसे लंबी गुफा की रहस्यमयी दुनिया




हाल ही में बलुआ पत्थरों की दुनिया की सबसे लंबी गुफ़ा का पता भारत के मेघालय में चला है. मैं इसकी एक झलक पाने के लिए गुफ़ा विज्ञानियों की एक टीम के साथ इस गुफ़ा तक गया.











भयावह दिखने वाली इस गुफ़ा के बेतरतीब प्रवेश द्वार पर अपनी उंगलियां गड़ाते हुए ब्रायन डी खरप्राण चेतावनी देते हैं, "अगर आप अंदर गुम हो गए तो आप इससे बाहर आने का रास्ता कभी ढूंढ़ नहीं पाएंगे." 

 







जंगलों की ढलान पर पेड़, पौधों से करीब एक घंटे तक गुजरते हुए हम क्रेम परी के मुहाने पर पहुंचे. इसे स्थानीय भाषा में यही कहा जाता है.


समुद्र तट से 4,025 फीट की ऊंचाई और सामने गहरी घाटी, यह गुफ़ा खड़े चट्टान के मुहाने पर स्थित है. ज़िब्राल्टर से आकार में दोगुनी बड़ी यह 24.5 किलोमीटर गुफ़ा इस धरती पर सर्वाधिक बारिश के लिए मशहूर मासिनराम की हरी भरी वादियों में 13 वर्ग किलोमीटर में फैली है.


फरवरी तक वेनेजुएला की 18.7 किलोमीटर लंबी इमावारी येउता दुनिया की सबसे बड़ी ऐसी गुफ़ा थी.














71 वर्षीय बैंकर खरप्राण गुफ़ाओं के बारे में बहुत कुछ जानते हैं. वो इन भीषण बारिश वाले पहाड़ी राज्य में करीब ढाई दशक से इनकी खोज में लगे हैं.जब उन्होंने 1992 में इनकी खोज शुरू की थी तो मेघालय में एक दर्जन ज्ञात गुफ़ाएं थीं.


26 साल और 28 खोजी अभियान के बाद, वो और उनकी गुफ़ा विज्ञानियों, भूविज्ञानी, जलविज्ञानी, जीवविज्ञानी और पुरात्तवविदों की 30 सदस्यीय मजबूत अंतरराष्ट्रीय टीम ने राज्य में 1,650 गुफ़ाओं की खोज की है. मेघालय अब दुनिया के सबसे जटिल गुफ़ाओं में से कुछ के लिए जाना जाता है और यहां भारत के अन्य किसी भी जगह की तुलना में सबसे अधिक गुफ़ाएं हैं.
क्रेम पुरी पर वापस आते हैं, हम अंदर जाने के लिए तैयार हैं.







सख्त टोपी और हेडलैंप पहनकर, हम अंधेरे में उतरते हैं. बाईं तरफ नीचे की ओर एक छोटा सा गलियारा है. अगर आप इस बंद, अंधेरे गुफा में क्लॉस्टफोबिया-बढ़ाने वाले छेदों से होकर अपना रास्ता बनाना चाहते हैं तो आपको केविंग सूट पहनने की जरूरत होगी ताकि आप अपने पेट, हाथ और घुटनों पर रेंग सकें. मैंने नहीं पहना है इसलिए मैं ऐसा नहीं कर सकता.










मुख्य गलियारे पर, दो विशाल पत्थर साथ-साथ खड़े थे. आगे बढ़ने के लिए आपको इन पर चढ़ना होगा या इनके बगल से होकर गुजरना होगा.

मैं चतुराई से दोनों की कोशिश कर रहा हूं और मेरे जूते जोख़िम भरे इन चट्टानों के बीच फंस गए हैं. हम पानी से सटे हुए पत्थरों से आगे निकलते हैं जहां आगे हमें मंद धारा मिलती है. मॉनसून के दौरान, संभवतः यह एक तेज़ धारा में बदल जाएगी.

खरप्राण को दीवार पर एक बड़ी मकड़ी दिखी और हमें एक और चीज़ मिली जो भूवैज्ञानिकों के अनुसार चट्टानों में फंसे शार्क के दांत हैं. वो कहते हैं, "गुफ़ा रहस्यों भरी है."

क्रेम पुरी आपस में जुड़े सैकड़ों छोटे लंबे गलियारों का पेचीदा चक्रव्यूह है. इसकी आकृति बिल्कुल अलग है, जो इसे वास्तव में एक भूलभुलैया बनाती है.









यहां कुछ कन्दरा (स्टलैक्टाइट) और स्तंभ (स्टलैग्माइट) भी हैं. यहां प्रचुर मात्रा में जीव, मेंढक, मछली, विशाल हंटर मकड़ियां और चमगादड़ भी हैं.


एक स्विस गुफ़ा विज्ञानी और गुफ़ा का नक्शा बनाने के विशेषज्ञ थामस अर्बेन्ज कहते हैं, "इस गुफ़ा का सर्वे करना बहुत मुश्किल चुनौती है."


आपको इसकी झलक मिलती है जब गुफ़ा की दीवारों, गलियारे, गड्ढों, चट्टानों की श्रेणियों और बड़े चट्टानों को सर्वेयर के दिए नाम आप बहुत बारीकी से देखने पर नक्शे पर पाते हैं.


उदाहरण के लिए, द ग्रेट व्हाइट शार्क एक धूसर चट्टान है जो शार्क के समान है और कैन्यन के बीचों बीच स्थित है.


भंगुर बलुआ पत्थर की इन श्रेणियां चलना दुभर हो जाता है. स्लीपी लंच नामक एक गलियारे में कुछ राहत है जहां थके सर्वेयर ने लंच किया था.














गुफ़ा खोजने वाले इतालवी वैज्ञानिक फ्रांसेस्को साउरो कहते हैं कि उन्होंने कुछ शार्क के दांतों की पहचान की है और उन्हें कुछ हड्डियां मिली हैं जो समुद्री डायनासोर की हो सकती हैं जो छह करोड़ साल पहले समुद्र में पाए जाने वाले आम जानवर थे.

इनमें से कई गुफ़ा के उन इलाकों में हैं जहां पहुंचना बहुत ख़तरनाक और मुश्किल है.

साउरो कहते हैं कि यहां कई और भी चीज़ें पाई गई हैं जिनका वैज्ञानिक विश्लेषण किए जाने के बाद ही खुलासा किया जाएगा.








 वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी दूर दूर तक संभावना नहीं है क्योंकि खानबदोश आदिमानव आमतौर पर बड़े गुफ़ा या चट्टानी जगहों को रहने के लिए चुनते थे. इसके अलावा बारिश के दिनों में यह जगह रहने के लिहाज से उपयुक्त नहीं है, और इसका मतलब यह भी है कि मेघालय की अधिकतर गुफ़ाओं में इंसान नहीं रहते थे.

यह बलुआ पत्थर से बनी गुफ़ाएं हैं जो इन्हें अनोखा बनाती हैं. यहां आमतौर पर चूना पत्थरों के विघटन से गुफ़ाओं का निर्माण होता है.




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दुनिया की ऐसी चीटियां जो खुद को उड़ा लेती हैं और रिसर्च में नाम मिला है फिदायीन, हैं बेहद खतरनाक

दुनिया की ऐसी चीटियां जो खुद को उड़ा लेती हैं और रिसर्च में नाम मिला है फिदायीन, हैं बेहद खतरनाक




नन्हीं चीटियों को उनकी मेहनत की वजह से जाना जाता है। वो धुन की पक्की होती हैं और बिना काम पूरा किए नहीं रुकतीं। 










इसके अलावा उनकी तारीफ़ इसलिए भी होती है कि वो खुद काफी छोटी होने के बावजूद अपने से कई गुना ज्यादा वजन उठाकर ले जाती हैं। चीटियों का सामाजिक ताना-बाना भी गजब का है, लेकिन अब ऐसी खबर आई है जो आपको हैरान कर सकती है। 

 






दुनिया को अब ऐसी चीटियों के बारे में पता चला है कि जो शहादत देती हैं। ये चीटियां फिदायीन हमलावर की तरह खुद में धमाका कर लेती हैं।













जी हां, आपने सही पढ़ा। न्यूयॉर्क टाइम्स ने जर्नल जूकीज में छपी स्टडी के हवाले से बताया है कि ब्रुनेई के कुआला बेलालॉन्ग फील्ड स्टडीज सेंटर के सामने पेड़ों के करीब चीटियों के ऐसे कई घर हैं, जो अपने घर पर हमला होने की सूरत में अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटतीं




इन चीटियों को धमाका करने की खास प्रवृति की वजह से कोलोबोपसिस एक्सप्लोडेंस कहा जाता है।







जब इनके घोंसलों पर हमला या अतिक्रमण किया जाता है तो वो अपने पेट में धमाका कर लेती हैं। ऐसा करने से उनके पेट से चिपचिपा, चमकीला, पीला फ्लूइड निकलता है, जो जहरीला होता है।








जिस तरह मधुमक्खी डंक मारने के बाद दम तोड़ देती है, उसी तरह ये चींटियां भी अपनी जान दे देती हैं।













लेकिन उनकी ये शहादत कॉलोनी को बचा लेती है। वैज्ञानिक खुद फटने वाली इन चीटियों के बारे में दो सौ साल से ज्यादा वक्त से जानते हैं 







 और सबसे पहले 1916 में इनके बारे में लिखा गया था। लेकिन साल 1935 से इस समूह की चींटियों को कोई आधिकारिक नाम नहीं दिया गया था।




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