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Sunday, February 4, 2018

आसमान को छूती दुनिया की 5 सबसे ऊंची इमारतें

आसमान को छूती दुनिया की 5 सबसे ऊंची इमारतें



ऊंची-ऊंची इमारतों की ऊपरी मंजिल में जाकर नीचे देखना कितना रोमांच भरा होता है। और इतनी ऊंचाई से नीचे देखने में डर भी बहुत लगता है। इतनी ऊंची इमारतों को देखकर सभी लोग हैरान होते हैं। दस मंजिल से ऊंची इन इमारतों को ही स्काई स्क्रैपर कहते हैं। चाहे इन बहुमंजिला इमारतों में लोग रहते हों, किसी का ऑफिस हो या फिर कोई मॉल वगैरह हो, कहेंगे इसे स्काई स्क्रैपर ही। तीन सितंबर को वर्ल्ड स्काईस्क्रैपर्स डे है। दुनिया की पहली स्काई स्क्रैपर बिल्डिंग शिकागो की होम इंश्योरेंस बिल्डिंग थी। तो चलिए आपको बताते हैं इस स्काईस्क्रैपर्स डे पर कुछ खास स्काईस्क्रैपर्स(ऊंची इमारतें) के बारे में। आज दुनिया में ऐसी कई मशहूर ऊंची इमारते हैं जिन्हें लोग देखने जाते हैं।










बुर्ज खलीफा:


साल 2010 में बनी बुर्ज खलीफा दुबई में बनी दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है। दुनिया की सबसे ऊंची इमारत का खिताब अपने नाम करने वाली दुबई की ये बिल्डिंग विजनरी आइडिया और साइंस का बेहतरीन कॉम्बिनेशन है। इसके अलावा दुनिया की सबसे ऊंची फ्रीस्टैंडिंग इमारत, सबसे तेज और लंबी लिफ्ट, सबसे ऊंची मस्जिद, सबसे ऊंचे स्विमिंग पूल और सबसे ऊंचे रेस्टोरेंट का खिताब भी बुर्ज खलीफा के नाम ही दर्ज है।








इसकी लंबाई 828 मीटर है और इसमें 163 मंजिलें हैं। इस बिल्डिंग का निर्माण कार्य 2004 में शुरू हुआ था और आधिकारिक रूप से 2010 में इसका उद्घाटन किया गया। दुबई के डाउनटाउन में मौजूद इस बिल्डिंग को 2010 में पब्लिक के लिए खोला गया। इसका नाम यूएई के प्रेसिडेंट खलीफा बिन जाएद अल नाहयान के नाम पर रखा गया। यह इस्लामिक आर्किटेक्चर का बेहतरीन नमूना है। इसमें घर ऑफिस शॉपिंग माल होटले के अलावा 30 एकड़ में बनी झील भी है। इस इमारत के निर्माण में लगभग 97 अरब रुपए की लागत आयी।












शंघाई टावर:


चीन के शंघाई में साल 2015 में बनी यह बिल्डिग 632 मीटर लंबी है और इसमें 128 फ्लोर हैं। शंघाई टावर बनाने में लगभग 2.4 अरब डॉलर की लागत आई है। इस इमारत को बनाने का काम 2008 में शुरू हुआ था। इसकी डिज़ाइन अमरीकी कंपनी जेंसेलर ने तैयार की है। पिछले साल इस इमारत के नज़दीक की ज़मीन पर दरारें दिखने के बाद इसके धंसने की चिंताएं ज़ाहिर की गईं थीं। चीन का शंघाई टावर दुनिया की सबसे ऊंची इमारत दुबई के बुर्ज खलीफा से लगभग 200 मीटर छोटा है।







रॉयल क्लॉक टावर होटल:


सऊदी अरब के मक्का में अब्राज अल-बत टावर क्लॉक के नाम से भी जानी जाती है। यह 601 मीटर ऊंची इमारत है। यह साल 2012 में बनी थी । इस बिल्डिंग के ऊपर 120 वें फ्लोर पर एक जर्मन आर्किटेक कंपनी ने क्लॉक टावर बनाया है।











वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर:


अमेरिका के इतिहास में सबसे बड़ा हमला झेलने वाले वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की जगह बनाए गए वन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का ऑब्जरवेशन डेक गुरुवार को मीडिया के लिए खोला गया। वन वर्ल्ड 104 मंजिल का है। आम लोगों के लिए डेक 29 मई को खोला जाएगा। यहां से चारों तरफ 80 किमी दूर तक का नजारा दिखता है। यहां से न्यूयॉर्क, मैनहटन, स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी, ब्रुकलिन ब्रिज, एंपायर स्टेट बिल्डिंग और ग्राउंड जीरो मेमोरियल साफ-साफ दिखता है।








डेक पर बड़ा मैग्नीफाइंग ग्लास लगा है। इससे नीचे का नजारा ज्यादा बेहतर दिखाई पड़ता है। इमारत के ग्राउंड फ्लोर से डेक तक हाई स्पीड लिफ्ट से आने में 47 सेकंड लगते हैं। 2014 में न्यूयॉर्क में बना 541 मीटर ऊंचा यह ट्रेड सेंटर अमेरिका की सबसे ऊंची बिल्डिंग है। इसमें 104 फ्लोर हैं। इसके टिकट की कीमत 2030 रुपए है।










ताइपे 101:



ताइवान में नीले-हरे कांच की दीवारों के साथ 509 मीटर की ऊंचाई वाली ताइपे दुनिया में सबसे बड़ी हरे रंग की बिल्डिंग है । इसे लीडरशिप इन एनर्जी और एनवायरमेंट डिजाइन(एलईईडी) अवॉर्ड भी मिल चुका है। 508 मीटर ऊंची और 101 फ्लोर वाली इस बिल्डिंग में ज्यादातर ऑफिस हैं।











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Thursday, October 26, 2017

भारत बनाएगा दुनिया की सबसे ऊंची इमारत, बुर्ज खलीफा को देगा टक्कर!

 भारत बनाएगा दुनिया की सबसे ऊंची इमारत, बुर्ज खलीफा को देगा टक्कर!



बीते रविवार को सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने मुंबई वॉटरफ्रंट पर दुबई की बुर्ज खलीफा से भी ऊंची इमारत बनाने का दावा किया है।










गडकरी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ये उनका भी ड्रीम प्रोजेक्ट है।









 उनके मुताबिक इस पूरे प्रोजेक्ट और बंदरगाह के सौंदर्यीकरण के बारे में केंद्र सरकार को प्लान भेजा गया है। 












 हालांकि उनके मंत्रालय को अभी केंद्र की मंजूरी का इंतजार है।









दुनिया की सबसे बड़ी इमारत: बुर्ज खलीफा


दुबई में मौजूद बुर्ज खलीफा दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है। इस इमारत की ऊंचाई 2,717 फीट है। इसमें करीब 163 फ्लोर हैं।











इनमें से 154 फ्लोर व्यवसायिक काम के लिए और 9 फ्लोर मैंटिनेंस के लिए सुरक्षित हैं।






इस इमारत को बनाने की शुरुआत जनवरी 2004 में हुई थी और अक्टूबर 2009 में पूरी बनकर तैयार हो गई थी। आधिकारिक रूप में इसे 4 जनवरी 2010 को खोला गया था।













एक अनुमान के मुताबिक इस इमारत को बनाने में करीब 1.5 अरब डॉलर का खर्चा आया था।






अगर केंद्र सरकार इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे देता है तो ये पूरा होने पर दुनिया का सबसे बड़ा आकर्षण बनकर उभरेगी। साथ ही दुनिया में भारत की एक अलग ही छवि बनकर उभरेगी।







अभी तक भारत की सबसे ऊंची इमारत पैलेस रोयाल  (1050 फीट) (88 मंजिल) है, जो  मुंबई में स्थित है।



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Monday, October 23, 2017

देश में सबसे प्रदूषित है पवित्र नगरी बनारस की हवा

देश में सबसे प्रदूषित है पवित्र नगरी बनारस की हवा




बनारस (जेएनएन)। पवित्र नगरी के नाम से मशहूर बनारस की हवा देश में सबसे खराब है। यहां की हवा में प्रदूषण का स्तर तय सीमा से कहीं ज्यादा है। आलम यह है कि वर्ष में अधिकतर दिन इस नगरी की हवा का स्तर बेहद खराब या वैज्ञानिक भाषा में कहें तो 'गुड' नहीं रहा है। एयर क्वालिटी में 'गुड' लेवल उस वक्त कहा जाता है जब एयर क्वालिटी इंडेक्स पर इसका स्तर 50 से नीचे होता है।











यदि इस इंडेक्स में शामिल किसी भी चीज का स्तर 100 को पार हो जाता है, तो इसको मोडरेट माना जाता है। जिसे बच्चों के लिए बेहद खतरनाक स्तर माना जाता है। वहीं इससे अधिक उम्र के लोगों में सांस लेने की समस्या हो जाती है।








इसका जिक्र सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों में दर्ज है।









इसके मुताबिक भारत में सबसे अधिक घनी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के दो शहर वाराणसी और इलाहाबाद में हवा का स्तर बेहद खतरनाक स्तर पर जा पहुंचा।










सीपीसीबी के आंकड़ों के मुताबिक यह रिपोर्ट किसी एक दिन की नहीं बल्कि वर्ष 2015 के दौरान करीब 220 दिन यहां पर हवा का स्तर बेहद खतरनाक था।









इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले एश्वर्या मदिनेनी के मुताबिक वाराणसी में हवा का स्तर लगातार खराब रहा है। करीब 150 दिन यहां की एयर क्वालिटी बेहद खतरनाक स्तर पर थी।








शोधकर्ताओं ने पाया है कि इस दौरान एयरबॉर्न पॉल्यूशन का स्तर 2.5 माइक्रो मीटर रहा, जो कि बेहद खतरनाक स्तर माना जाता है। यह सीधे तौर पर फेफड़े, खून और दिमाग पर असर डालता है। वर्ष 2015 के अक्टूबर और नवंबर माह में यही स्तर करीब दोगुना हो गया था। वर्ष 2016 में कोर्सर पार्टिकुलर्स का स्तर करीब 10 माइक्रो मीटर तक पहुंच गया था। यह पहले से करीब तीन गुणा ज्यादा था।









WHO की एक रिपोर्ट में यह बात निकलकर सामने आई कि दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से करीब बीस अकेले भारत में ही हैं। इसमें मध्य प्रदेश का ग्वालियर भी शामिल है। वहीं इलाहाबाद और देश की राजधानी दिल्ली भी उन्ही शहरों में शामिल है, जहां का टॉक्सिक लेवल काफी अधिक है।






दिल्ली में तो पिछले दिनों ही स्मॉग के चलते सभी स्कूलों को बंद करना पड़ा था। यहां तक कि कुछ देशों ने अपने पर्यटकों को यहां न आने को लेकर एडवाइजरी तक जारी की थी। गौरतलब है कि आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में हजारों की तादाद में श्रद्धालु और पर्यटक हर रोज पहुंचते हैं। 







दिल्ली में तो पिछले दिनों ही स्मॉग के चलते सभी स्कूलों को बंद करना पड़ा था। यहां तक कि कुछ देशों ने अपने पर्यटकों को यहां न आने को लेकर एडवाइजरी तक जारी की थी। गौरतलब है कि आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में हजारों की तादाद में श्रद्धालु और पर्यटक हर रोज पहुंचते हैं। 




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दुनिया की सबसे खतरनाक जगह, यहां किया गया 456 परमाणु बमों का टेस्ट

दुनिया की सबसे खतरनाक जगह, यहां किया गया 456 परमाणु बमों का टेस्ट


शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन समिट के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय कजागस्तान की यात्रा पर हैं। इसी सिलसिले में आज हम आपको कजागस्तान की सबसे खतरनाक जगह यानी कि ‘द पॉलिगन’ एटमिक टेस्ट साइट के बारे में बता रहे हैं। कजागस्तान की यह जगह आम लोगों के लिए प्रतिबंधित है, क्योंकि यहां आज भी काफी मात्रा में रेडिएशन है। सोवियत यूनियन के परमाणु परीक्षण के लिए यह दुनिया की सबसे बड़ी साइट थी। साल 1949 से 1989 के बीच यहां 456 परमाणु बमों का टेस्ट किया गया।











कजागस्तान के ‘द पॉलिगन’ का आधिकारिक नाम सेमीपलाटिंस्क टेस्ट साइट है। इसका क्षेत्रफल 6,950 स्क्वॉयर किमी है। विशाल क्षेत्रफल के चलते सोवियत यूनियन ने इसका यूज अपने परमाणु बमों से लेकर कई तरह की मिसाइल टेस्ट के लिए किया। इस जगह को चुनने की एक और वजह यह थी कि ये सर्बिया के मुकाबले ये रूस की केपिटल सिटी मेक्सिको के करीब थी। इसके अलावा यहां का पूरा इलाका खाली थी और सैकड़ों किमी की दूरी तक कोई नहीं रहता था। सोवियत संघ ने इस टेस्ट साइट का निर्माण बहुत खुफिया तरीके से किया था। सन् 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद ही इस साइट का पता चला था।







यह सोवियत यूनियन का सीक्रेट बेस था, फ्लैट्स की शक्ल दी गई थी, जिससे कि किसी को यहां बेस होने का शक न हो। इसमें न्यूक्लियर बमों में यूज होने वाला सामान रखा जाता था। इसका निर्माण 1953 में किया गया। सोवियत यूनियन के विघटन के बाद यहां से भारी मात्रा में केमिकल बरामद किया गया था।










रशियन केमिकल फैक्ट्री, जहां परमाणु बमों के लिए तरह-तरह के केमिकल का टेस्ट किया जाता था।







यह मिलिट्री बेस जंगल में घनी झाड़ियों के बीच बनाया गया था। यहां एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम था, जहां भारी तादात में एंटी बैलिस्टिक मिसाइल और एंटी एयरक्राफ्ट मौजूद थे।








बिल्डिंग, जहां से न्यूक्लियर बमों की तीव्रता नापी जाती थी।







सोवियत यूनियन ने यहां तालाब बनाने के लिए 1965 में एटम बम गिराया था। दरअसल, साइंटिस्ट इस टेस्ट से ये देखना चाहते थे कि क्या परमाणु बमों का उपयोग झील, तालाब खोदने के लिए भी किया जा सकता है। हालांकि, यह प्रयोग फेल रहा, क्योंकि कई बार खाली होने व भरने के बावजूद इसका पानी आज तक रेडियोक्टिव है।










सेमिपालातिंस्क टेस्ट साइट। यहां सोवियत यूनियन ने 1949 से 1989 तक 456 न्यूक्लियर बमों का टेस्ट किया था।







आज भी इस इलाके में सोवियत यूनियन के समय की अब भी जर्जर मशीनें पड़ी हुई हैं।







सोवियत यूनियन के विघटन के बाद कजागस्तान ने 1992 में यह साइट आम लोगों के लिए पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दी गई थी, क्योंकि यहां बहुत रेडिएशन था, जो अब भी मौजूद है



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Sunday, October 22, 2017

क्‍या भारत में ही है स्कॉटलैंड

क्‍या भारत में ही है स्कॉटलैंड


भारत अपनी विविधता में प्राकृतिक सौंदर्य को समेटे हुए है, इसका हर राज्य अपनी एक अलग खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। पुरानी विरासतों और नए आर्किटेक्ट का संगम यहां के जैसा और कहीं नहीं मिल सकता। भौगोलिक सुंदरता की बात करें तो यहां एक ओर रेगिस्तान और दूसरी ओर बर्फ ही बर्फ नजर आती है। कहीं मंदिरों की बहुलता है तो कहीं पैगोडा की अद्भुत बनावट। गुवाहाटी के 











सिक्किम को छोड अन्य सभी उत्तर पूर्वी राज्यों त्रिपुरा, मिजोरम अरुणाचल, प्रदेश, मणिपुर, मेघालय नगालैंड का प्रवेश द्वार है. लेकिन यहां से मेघालय की राजधानी शिलांग जितनी करीब है अन्य राज्यों की नहीं. शिलांग कभी वृहत्तर असम की राजधानी था, फिर मेघालय के केंद्र शासित प्रदेश बनने व 1972 के बाद से नए मेघालय राज्य की स्वाभाविक राजधानी बन गया.







गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के एक ओर स्थित पल्टन बाजार ही वह स्थान है जहां से शिलोंग का सफर आरंभ होता है. यहां से दस किलोमीटर दूर जोरहाट राजमार्ग संख्या 37 जहां पूर्वी व दक्षिण पूर्व असम और आगे अरुणाचल प्रदेश , नगालैंड के लिए चला गया है तो यहीं से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 40 शिलांग होते हुए असम के कछार क्षेत्र से मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा के लिए निकलता है. 










गुवाहाटी से शिलांग तक की मात्र सौ किलोमीटर की दूरी तय करने पर इतना कुछ बदल जाता है कि यकीन नहीं आता. गुवाहाटी में आप जहां अपने को पहाडियों से घिरा पाते हैं तो शिलांग में पहाडियों के बीच. पहनावे, कुदरत के नजारे, जलवायु, इमारतों की शली, खानपान और भाषा सब बदल जाते है जो सब एक नएपन का अहसास दिलाते हैं.







उत्तर पूर्व की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस क्षेत्र में रेल का कम विस्तार होने से परिवहन तंत्र सडक पर ही निर्भर है. मेघालय भी इसका अपवाद नहीं है इसलिए यहां का हर राजमार्ग वाहनों के दबाव से जूझता लगता है. शिलांग से गुजरने वाले दो लेन के राजमार्ग की स्थिति आज यह है








कि कहीं बीच में कोई वाहन खराब या दुर्घटनाग्रस्त हुआ नहीं कि कई किमी लंबी कतार लग जाती हैं और घंटों तब जाम में फंसा रहना पड सकता है. यदि जाम न लगे तो सामान्य तौर पर बस या टैक्सी से शिलांग का सफर साढे तीन से चार घंटे में पूरा हो जाता है. हालांकि इसे चार लेन में परिवर्तित किया जा रहा है.






जोरहाट से थोडा चलकर मेघालय की सीमा आरंभ हो जाती है और पहाडी मार्ग आरंभ हो जाता है. पहले बर्नीहाट और फिर बाद नोंगपो पडता है जो कि इस मार्ग का मध्य बिन्दु है. टेढे-मेढे पहाडी रास्तों के बाद लगभग ढाई से तीन घंटे की दूरी पर बरापानी आता है जहां से एक रास्ता स्थानीय हवाई अड्डे उमराई की ओर चला गया. यहां से 30 मिनट बाद आप शिलांग के केंद्र पुलिस बाजार में होते हैं.










मेघालय एक पहाडी राज्य है जिसके तीन ओर असम की सीमा व दक्षिण व दक्षिण पश्चिम में बांग्लादेश है. यह तीन अलग-अलग क्षेत्रों गारो, खासी, जन्तिया पहाडियों से मिल कर बना है. राज्य के दक्षिण पूर्व का वह भाग जो असम के कछार क्षेत्र से लगा है जन्तिया हिल्स कहलाता है. मध्य भाग खासी हिल्स व पश्चिमी क्षेत्र गारो हिल्स कहलाता है. एक राज्य होने के बावजूद इन क्षेत्रों की लोकपरंपराएं, भाषा व मान्यताएं भी भिन्न हैं. राज्य की 85 प्रतिशत आबादी जनजातीय है जिनमें से 70 फीसदी ईसाई धर्मावलंबी है किन्तु बावजूद इसके इनके समाजों की अपनी मूल परंपराएं भी बरकरार हैं.






इस क्षेत्र अधिपत्य करने के बाद अंग्रेजों ने चेरापूंजी को जिला मुख्यालय बनाया किंतु अत्यधिक वर्षा होने के कारण वे इसे 55 किमी. दूर शिलांग ले आए जो उनके स्काटलैंड जैसी बनावट लिए था. बाद में शिलांग को वृहत्तर असम की राजधानी बना दिया गया. आजाद भारत में असम में यह एक स्वायत्त क्षेत्र बना दिया गया. किन्तु लगातार मांग के बाद 1972 में जब मेघालय अलग राज्य बना तो शिलांग उसकी स्वाभाविक राजधानी बन गया. शिलांग खासी पहाडियों का दिल है.









समुद्र तल से लगभग 1200 से 1900 मीटर के मध्य बसा शिलांग उनके लिए एक आदर्श स्थान है जो कुछ दिन सुकून के साथ बिताना चाहते हैं. स्वच्छ वातावरण, मनोरम नजारे, ठंडी जलवायु और शान्त माहौल आस-पास अनेक दर्शनीय स्थलों की उपलब्धता. जहां अन्य हिल स्टेशनों में वाहन योग्य मार्गों का अभाव है वहीं इस नगर में हर ओर जाने के लिए अच्छी सडकें हैं. इसलिए इसका चारों ओर विस्तार हुआ है. राज्य की राजधानी होने के कारण यहां पर हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध है.



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