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Saturday, June 30, 2018

इतना डराने क्यों लगा है जीवन देने वाला 'पानी'

इतना डराने क्यों लगा है जीवन देने वाला 'पानी'



जलसंकट की डरावनी सच्चाई, पानी के लिए हो रहे हैं खून, अदालत में लड़ रहे राज्य, आखिर पानी के बिना कैसा होगा हमारा भविष्य? 








राजधानी दिल्ली के वजीरपुर इलाके में 17 मार्च को लाल बहादुर नाम के 60 वर्षीय एक बुजुर्ग की टैंकर से पानी भरने को लेकर हुए झगड़े में पड़ोसियों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी.


इसी साल फरवरी में भरतपुर (राजस्थान), रूपवास थाना क्षेत्र में आने वाले गांव खानसूरजापुर के एक हैंडपंप पर पानी भरने को लेकर हुए झगड़े में सुनीता नामक महिला की मौत हो गई.







इसी अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मध्य प्रदेश के डबरा स्थित कैरुआ गांव में पानी विवाद को लेकर ब्रजेन्द्र नामक एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई.पानी की किल्लत ऐसी कि जान की कीमत भी कम पड़ रही है.


ये वाकये पानी को लेकर बढ़ती जद्दोजहद में एक-दूसरे की जान तक ले लेने के चंद उदाहरण मात्र हैं. गली-मुहल्लों में पानी को लेकर लाठी-डंडे चलना आम बात होती जा रही है. इससे समझा जा सकता है कि देश में पानी को लेकर हालात किस हद तक गंभीर हो चले हैं.









मेरे गांव में कुछ साल पहले तक 20 मीटर नीचे तक पानी मिल जाता था. लेकिन अब नल मुश्किल से 70-80 मीटर पर पानी देता है. जबकि मेरा गांव दो नदियों के बीच यानी दोआब में पड़ता है. गर्मियों में नल पानी छोड़ने लगता है. पानी का पाताल में जाना बदस्तूर जारी है. यह गहराते जल संकट की एक डरावनी सच्चाई है. कुछ क्षेत्रों में तो पेयजल के लिए चार-पांच किलोमीटर तक लोग पानी ढोने को मजबूर हैं.







हालात ये हैं कि आम आदमी से लेकर सरकारें तक पानी के झगड़े में उलझी हुई हैं. पानी अब चुनावी मुद्दा बन गया है. नेताओं के लिए वोट लेने का औजार बन गया है. एक तरफ पानी के लिए कई राज्यों में हाहाकार मचा हुआ है तो दूसरी ओर सूखे की चपेट वाले बुंदेलखंड में बोतलबंद पानी बेचने वाली 25 रजिस्टर्ड कंपनियां लाखों का कारोबार कर रही हैं.


पानी न सिर्फ आदमी, पशु-पक्षियों और जानवरों सबके जीने की पहली शर्त है, बल्कि आज तेल के बाद वह दुनिया का सबसे बड़ा मुद्दा भी है. धरती से पानी बूंद-बूंद कम होता जा रहा है और हम अपने जलस्रोतों को मिटाते जा रहे हैं.









मनुष्य के शरीर में लगभग 60 फीसदी पानी होता है. मतलब पानी तो सबकी जरूरत है. संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक पीने के साफ पानी की मांग 40 फीसदी तक बढ़ सकती है. इसलिए हम सबको मिलकर पानी के प्रबंधन के लिए सही मैनेजमेंट करना होगा.

मार्च 2016 में महाराष्ट्र के लातूर शहर में पानी को लेकर इतना संघर्ष था कि प्रशासन ने धारा 144 लगा दी थी. सूखे की मार और उसके बाद पानी की किल्लत से जूझ रहे इस शहर में पहली बार ट्रेन से पानी की आपूर्ति करनी पड़ी थी. तब वहां के लोगों को पानी की कीमत का पता चला था. ऐसे हालात आपके क्षेत्र में भी पैदा हो सकते हैं.


जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है पानी पाताल में जा रहा है. दिल्ली से सटा साइबर सिटी गुड़गांव दुनिया भर में विख्यात है. लेकिन, इसी का एक हिस्सा है मेवात, जिस पर न सिर्फ देश के सबसे पिछड़े जिले का कलंक लगा हुआ है बल्कि यहां के लोग भयंकर जल संकट से दो-चार हो रहे हैं. यहां कुछ ऐसे इलाके हैं जहां जो पानी पशु पीते हैं वही पानी इंसान भी पीने को मजबूर हैं.






हरियाणा, दिल्ली, यूपी, राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश, बिहार आदि जल संकट से जूझ रहे हैं. पानी को लेकर उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक तक लड़ाई जारी है. इस साल जल संकट और बढ़ने की आशंका है. इसीलिए सेंट्रल वॉटर कमीशन ने आने वाले दिनों में पानी की संभावित कमी से बचने के लिए फरवरी में ही राज्यों को एडवाइजरी जारी कर दी थी.











पानी के संकट से निपटें तब तो उसकी गुणवत्ता पर बात करें, लेकिन इसकी बात इसलिए जरूरी है क्योंकि ज्यादातर बीमारियां खराब पानी की देन हैं. पानी की गुणवत्ता जांचने वाली प्रयोगशालाएं 130 करोड़ लोगों पर सिर्फ 2289 हैं. यानी कोई व्यक्ति आसानी से यह पता नहीं कर सकता कि वो जो पानी पी रहा है वह कैसा है. पता तब चलता है जब वह किसी बीमारी का शिकार हो चुका होता है.

जल संसाधन मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा है कि देश के विभिन्न हिस्सों में भूजल संकट साफ पानी की बढ़ती मांग, बारिश में विविधता, बढ़ी हुई आबादी, औद्योगीकरण और शहरीकरण की वजह से है. जबकि पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर कहते हैं, "हमने अपने आसपास पानी रिचार्ज करने के तंत्र बंद कर दिए और सिर्फ बड़े-बड़े बांधों पर ध्यान लगाया, इससे जल संकट और बढ़ गया. सरकारों ने पानी बचाने के काम में कभी लोगों को नहीं जोड़ा, इससे संकट और बढ़ता गया और बढ़ता रहेगा."








बेतरतीब विकास, अंधाधुंध शहरीकरण और लापरवाही से संसाधनों के हो रहे दोहन ने हमें पानी की विकट समस्या के बीच ला खड़ा किया है. हमें तो शायद पानी उपलब्ध हो भी जाए, मगर आने वाली पीढ़ियों के लिए हालात कैसे रहेंगे इसकी कल्पना भी मन में सिहरन पैदा कर देती है.




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Thursday, April 26, 2018

फीचर फोन की दुनिया में JioPhone बना नंबर वन, अबतक कुल चार करोड़ फोन बिके

फीचर फोन की दुनिया में JioPhone बना नंबर वन, अबतक कुल चार करोड़ फोन बिके



जियो के रेवेन्यू में जियोफोन की भूमिका को स्टडी करते हुए बताया गया है कि अब तक कुल चार करोड़ जियोफोन की बिक्री हो चुकी है.













रिलायंस जियो ने दो साल से भी कम वक्त में देश की तीन टॉप टेलीकॉम ऑपरेटर्स के बीच अपनी जगह बना ली है. Counterpoint की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 के पहले तिमाही में जियो फोन फीचर फोन के सेगमेंट में नंबर वन बन गया है.










इस सेगमेंट में रिलायंस जियो 35.8% मार्केट शेयर के साथ नंबर वन बन गया है. जियो के रेवेन्यू में जियोफोन की भूमिका को स्टडी करते हुए बताया गया है कि अब तक कुल चार करोड़ जियोफोन की बिक्री हो चुकी है.














टेलीकॉम इंडस्ट्री पर क्रेडिट सूइस के एक सर्वे में बताया गया है कि हाल की मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि साल 2018 की जनवरी-मार्च तिमाही में जियोफोन की फीचर फोन सेगमेंट में 36 फीसदी बाजार हिस्सेदारी रही.

रिसर्च में कहा गया है, "इस तिमाही में जियोफोन की बिक्री करीब 2.1 करोड़ रही, इस हिसाब से हर माह 70 लाख जियोफोन की बिक्री हुई."








रिपोर्ट में कहा गया है, "नतीजों से यह पता चलता है कि जियो अब शुरुआती खरीद की अवधि को पार कर चुका है और लोगों ने इसे अच्छी तरह स्वीकार किया है. बहुत जल्द यह दूसरी कंपनियों के ग्राहकों को अपनी ओर खींचेगी और अन्य फीचर फोन की बाजार हिस्सेदारी में सेंध लगाएगी. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सेगमेंट में जियो किस तरह के डेटा एक्सपीरियंस यूजर्स को देता है."











रिपोर्ट में कहा गया है कि जियो ने स्मार्टफोन सेगमेंट में लगातार प्रति फोन 10 जीबी/प्रति महीने से अधिक का डेटा खपत दर्ज किया है. सर्वे में कहा गया, "हमें आश्चर्य होगा, अगर फीचर फोन यूजर्स भी स्मार्टफोन यूजर्स जितना ही डेटा की खपत करेंगे."










आपको बता दें जियो फोन को रिलायंस जियो ने साल जुलाई 2017 में लॉन्च किया था.















इस स्मार्टफोन को खरीदने के लिए 1500 रुपये ग्राहक को देने पड़ते हैं जो 36 महीनों के बाद वापस कर दिए जाते हैं.









 फीचर फोन सेगमेंट में ये पहला 4G VoLTE फोन है. इस पर ग्राहक यूट्यूब, फेसबुक, गूगल सर्च का इस्तेमाल कर सकता है.




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दुनिया की ऐसी चीटियां जो खुद को उड़ा लेती हैं और रिसर्च में नाम मिला है फिदायीन, हैं बेहद खतरनाक

दुनिया की ऐसी चीटियां जो खुद को उड़ा लेती हैं और रिसर्च में नाम मिला है फिदायीन, हैं बेहद खतरनाक




नन्हीं चीटियों को उनकी मेहनत की वजह से जाना जाता है। वो धुन की पक्की होती हैं और बिना काम पूरा किए नहीं रुकतीं। 










इसके अलावा उनकी तारीफ़ इसलिए भी होती है कि वो खुद काफी छोटी होने के बावजूद अपने से कई गुना ज्यादा वजन उठाकर ले जाती हैं। चीटियों का सामाजिक ताना-बाना भी गजब का है, लेकिन अब ऐसी खबर आई है जो आपको हैरान कर सकती है। 

 






दुनिया को अब ऐसी चीटियों के बारे में पता चला है कि जो शहादत देती हैं। ये चीटियां फिदायीन हमलावर की तरह खुद में धमाका कर लेती हैं।













जी हां, आपने सही पढ़ा। न्यूयॉर्क टाइम्स ने जर्नल जूकीज में छपी स्टडी के हवाले से बताया है कि ब्रुनेई के कुआला बेलालॉन्ग फील्ड स्टडीज सेंटर के सामने पेड़ों के करीब चीटियों के ऐसे कई घर हैं, जो अपने घर पर हमला होने की सूरत में अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटतीं




इन चीटियों को धमाका करने की खास प्रवृति की वजह से कोलोबोपसिस एक्सप्लोडेंस कहा जाता है।







जब इनके घोंसलों पर हमला या अतिक्रमण किया जाता है तो वो अपने पेट में धमाका कर लेती हैं। ऐसा करने से उनके पेट से चिपचिपा, चमकीला, पीला फ्लूइड निकलता है, जो जहरीला होता है।








जिस तरह मधुमक्खी डंक मारने के बाद दम तोड़ देती है, उसी तरह ये चींटियां भी अपनी जान दे देती हैं।













लेकिन उनकी ये शहादत कॉलोनी को बचा लेती है। वैज्ञानिक खुद फटने वाली इन चीटियों के बारे में दो सौ साल से ज्यादा वक्त से जानते हैं 







 और सबसे पहले 1916 में इनके बारे में लिखा गया था। लेकिन साल 1935 से इस समूह की चींटियों को कोई आधिकारिक नाम नहीं दिया गया था।




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Tuesday, January 2, 2018

सुरक्षा के दावों की खुली पोल, जयपुर में पुलिस की कड़ी चौकसी के बीच सोती हुई दो साल की बच्ची गायब

 सुरक्षा के दावों की खुली पोल, जयपुर में पुलिस की कड़ी चौकसी के बीच सोती हुई दो साल की बच्ची गायब




 राजधानी जयपुर में पुलिस की कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की पोल आज खुल गई। न्यू ईयर से एक दिन पहले पुलिस की भारी सुरक्षा और कड़ी चौकसी के बीच वीआईपी इलाके में फुटपाथ पर सो रही दो साल की मासूम बच्ची अचानक लापता हो गई। यह बच्ची माता-पिता के साथ सो रही थी। घटना राजधानी जयपुर के अशोक नगर थाना इलाके की है।













जानकारी के मुताबिक अशोक मार्ग सी स्कीम के पास एमजीडी स्कूल के पास फुटपाथ पर भगवानी देवी और भैरूलाल अपनी दो साल की मासूम बेटी माया के साथ सो रहे थे। इनके साथ दादी दादी समेत करीब आधा दर्जन लोग भी सोए हुए थे। करीब तीन बजे अचानक मां भगवानी देवी की नींद खुल गई। इस दौरान सोती हुई बच्ची माया गायब मिली। घबराकर भगवानी ने अपने पति भैरूलाल को जगाया। 








बच्ची नहीं मिलने पर दोनों ने चिल्लाना और रोना शुरू कर दिया। इस दौरान दोनों ने पहले अपनी बच्ची को काफी तलाशा। काफी तलाशने के बाद भी बच्ची नहीं मिली। इस पर भैरूलाल और भगवानी देवी ने जयपुर पुलिस कंट्रोल रूम में फोन किया। सूचना मिलने पर अशोक नगर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और परिजनों से पूछताछ की। 












पुलिस ने बच्ची को तलाशने के लिए टीमें भी दौड़ाई। लेकिन बच्ची नही मिली। बाद में पुलिस ने मामले की जांच करते हुए आसपास के सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले। लेकिन पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला। 







पुलिस के मुताबिक पीडित परिवार राजसमंद का रहने वाला है और जयपुर में रहकर गुब्बारे बेचने का कार्य करता है। परिवार सिर्फ फुटपाथ पर रहकर ही अपनी जिंदगी गुजर बसर कर रहा है। 












लेकिन हैरानी की बात ये है कि अगर बच्ची को कोई उठाकर ले गया है तो पुलिस की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में हैं। न्यू ईयर से दो दिन पहले जयपुर कमिश्नरेट की ओर से जयपुर में सुरक्षा व्यवस्था कायम करने के पुख्ता इंतजामात किए जाने का दावा किया गया था। साथ ही चप्पे चप्पे पर पुलिस का पहरा होने के भी दावे किए गए थे। लेकिन बच्ची के गायब होने ने दावों की पोल खोल कर रख दी है।










साथ ही, पुलिस की पूरी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठा दिए हैं। खास बात ये है कि जो बच्ची गायब हुई है वह वीआईपी इलाके सी स्कीम से, जहां पर हर समय पुलिस गश्त पर रहती है, ऐसे में बच्ची कैसे गायब हो गई यह एक बड़ा सवाल है।














बहरहाल, बच्ची को कोई उठाकर कर ले गया है या फिर बच्ची खुद अपने आप उठकर चली गई है, इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर पुलिस अन्य सीसीटीवी फुटेज के आधार और लापता बच्ची का पता लगाने में जुट गई है। 









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Friday, October 13, 2017

अच्छा तो सऊदी अरब की औरतो की ज़िन्दगी ऐसी होती है

अच्छा तो सऊदी अरब की औरतो की ज़िन्दगी ऐसी होती है


सऊदी अरब में महिलाओ की ज़िन्दगी में कई प्रकार की बंदिशे लगाई गयी है। यहां के सख्त कानून और नियम की वजह से महिलाओ को कई मुश्किलो का सामना करना पड़ता है। ब्रिटिश डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर ओलिविया ऑर्थर ने यहां घर में कैद रहने वाली महिलाओ की ज़िन्दगी को अपने कैमरे में कैद किया है,















वह ब्रिटिश काउंसलिंग की ओर से जेद्दाह में महिलाओ के लिए फोटोग्राफी के एक वर्कशॉप में गयी थी, इस वक्त अपने अनुभवो को उन्होंने जेद्दाह डायरी नाम की एक बुक में सामने रख दिया। ओलिविया ने फोटोग्राफी वर्कशॉप में आने वाली कई कठिनाइयों का सामना कर अपने अनुभवो को शेयर किया।










उन्होंने यह बताया कि यह ऐसे पाबन्दियों वाला देश है जहाँ महिलाओ को सड़क पर एक फोटो खीचने के बदले कई फटकार का सामना करना पड़ता है।











वर्कशॉप में आने वाली महिलाओ और लड़कियों से उन्होंने कई प्राथनाए की तब जाकर फोटो मिली। ओलिविया के अनुसार फोटोज लेने में सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि यहां महिलाए सर से पैर तक ढकी रहती है और इसके बिना वो फोटो भी नहीं खिचवाती।










उन्होंने बताया की शुरुवात में मैं बहुत ही अपसेट थी कि इन फोटोज का इस्तमाल मैं कहा कर सकुंगी, मुझे ये तय करने में बड़ा लंबा वक्त लगा कि इन्हें कैसे इस्तमाल कारन है। 










बाद में लगा कि ये फोटोज मेरे प्रोजेक्ट में काफी मदद करेंगी। ये सऊदी अरब में रहने वाली अजीबोगरीब नियमो और दरवाजो के पीछे बंद महिलाओ की ज़िन्दगी को सामने लाने में मददगार साबित हो जाएगी।










सऊदी अरब में महिलाओ की ज़िन्दगी में कई प्रकार की बंदिशे लगाई गयी है। यहां के सख्त कानून और नियम की वजह से महिलाओ को कई मुश्किलो का सामना करना पड़ता है। ब्रिटिश डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर ओलिविया ऑर्थर ने यहां घर में कैद रहने वाली महिलाओ की ज़िन्दगी को अपने कैमरे में कैद किया है, वह ब्रिटिश काउंसलिंग की ओर से जेद्दाह में महिलाओ के लिए फोटोग्राफी के एक वर्कशॉप में गयी थी, इस वक्त अपने अनुभवो को उन्होंने जेद्दाह डायरी नाम की एक बुक में सामने रख दिया। ओलिविया ने फोटोग्राफी वर्कशॉप में आने वाली कई कठिनाइयों का सामना कर अपने अनुभवो को शेयर किया।













उन्होंने यह बताया कि यह ऐसे पाबन्दियों वाला देश है जहाँ महिलाओ को सड़क पर एक फोटो खीचने के बदले कई फटकार का सामना करना पड़ता है। वर्कशॉप में आने वाली महिलाओ और लड़कियों से उन्होंने कई प्राथनाए की तब जाकर फोटो मिली। ओलिविया के अनुसार फोटोज लेने में सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि यहां महिलाए सर से पैर तक ढकी रहती है और इसके बिना वो फोटो भी नहीं खिचवाती।








उन्होंने बताया की शुरुवात में मैं बहुत ही अपसेट थी कि इन फोटोज का इस्तमाल मैं कहा कर सकुंगी, मुझे ये तय करने में बड़ा लंबा वक्त लगा कि इन्हें कैसे इस्तमाल कारन है। बाद में लगा कि ये फोटोज मेरे प्रोजेक्ट में काफी मदद करेंगी। ये सऊदी अरब में रहने वाली अजीबोगरीब नियमो और दरवाजो के पीछे बंद महिलाओ की ज़िन्दगी को सामने लाने में मददगार साबित हो जाएगी।








सऊदी अरब में महिलाओ की ज़िन्दगी में कई प्रकार की बंदिशे लगाई गयी है। यहां के सख्त कानून और नियम की वजह से महिलाओ को कई मुश्किलो का सामना करना पड़ता है। ब्रिटिश डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर ओलिविया ऑर्थर ने यहां घर में कैद रहने वाली महिलाओ की ज़िन्दगी को अपने कैमरे में कैद किया है, वह ब्रिटिश काउंसलिंग की ओर से जेद्दाह में महिलाओ के लिए फोटोग्राफी के एक वर्कशॉप में गयी थी, इस वक्त अपने अनुभवो को उन्होंने जेद्दाह डायरी नाम की एक बुक में सामने रख दिया। ओलिविया ने फोटोग्राफी वर्कशॉप में आने वाली कई कठिनाइयों का सामना कर अपने अनुभवो को शेयर किया। उन्होंने यह बताया कि यह ऐसे पाबन्दियों वाला देश है जहाँ महिलाओ को सड़क पर एक फोटो खीचने के बदले कई फटकार का सामना करना पड़ता है। वर्कशॉप में आने वाली महिलाओ और लड़कियों से उन्होंने कई प्राथनाए की तब जाकर फोटो मिली। ओलिविया के अनुसार फोटोज लेने में सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि यहां महिलाए सर से पैर तक ढकी रहती है और इसके बिना वो फोटो भी नहीं खिचवाती। उन्होंने बताया की शुरुवात में मैं बहुत ही अपसेट थी कि इन फोटोज का इस्तमाल मैं कहा कर सकुंगी, मुझे ये तय करने में बड़ा लंबा वक्त लगा कि इन्हें कैसे इस्तमाल कारन है। बाद में लगा कि ये फोटोज मेरे प्रोजेक्ट में काफी मदद करेंगी। ये सऊदी अरब में रहने वाली अजीबोगरीब नियमो और दरवाजो के पीछे बंद महिलाओ की ज़िन्दगी को सामने लाने में मददगार साबित हो जाएगी।



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