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Saturday, June 30, 2018

कभी सोया टेंट में, कभी मिले 500 रुपए, यूं क्रिकेटर बना ये दुकानदार का बेटा

कभी सोया टेंट में, कभी मिले 500 रुपए, यूं क्रिकेटर बना ये दुकानदार का बेटा



शमी के पिता तौसिफ अली भी अपने जमाने में फास्ट बॉलर थे। हालांकि ज्यादा चांस नहीं मिलने की वजह से उनका सपना अधूरा रह गया। 








मोहम्मद शमी ने हाल ही में (3 सितंबर) अपना 28वां बर्थडे सेलिब्रेट किया। यूपी के अमरोहा के करीब एक छोटे से गांव सहसपुर के रहने वाले शमी बचपन से ही क्रिकेटर बनना चाहते थे। उनके पिता भी अपने जमाने के फास्ट बॉलर रहे, जिसके बाद अपने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने शमी को क्रिकेट सीखने के लिए कोलकाता भेज दिया।







शमी के पिता तौसिफ अली भी अपने जमाने में फास्ट बॉलर हुआ करते थे। हालांकि ज्यादा मौके नहीं मिलने की वजह से उनका सपना पूरा नहीं हो सका और उन्होंने ट्रैक्टर के स्पेयर पार्ट्स की दुकान खोल ली। 
- उनके तीनों बेटे भी उन्हीं की तरह अच्छे क्रिकेटर निकले और तीनों को फास्ट बॉलिंग का शौक रहा। इनमें से बड़े बेटे ने किडनी में पथरी होने के बाद फैमिली बिजनेस संभाल लिया।
- शमी बचपन से क्रिकेट के शौकीन रहे। उन्हें गांव में जहां जगह मिलती, वहीं वे गेंदबाजी करने लग जाते। घर के आंगन में, छत पर, बाहर खाली पड़ी जगह पर, 22 गज से लंबी हर जगह उसके लिए पिच होती थी।
- शमी शुरू से ही काफी फास्ट बॉलिंग करते आ रहे हैं, उनकी रफ्तान ने बहुत कम उम्र में ही उन्हें आसपास के गाँवों में फेमस बना दिया था। वे स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंटों का आकर्षण होते।
- तौसिफ अली ने तीनों बेटों के बीच अपने मझले बेटे यानी शमी को सबसे ज्यादा टैलेंटेड पाया इसलिए वे उन्हें मुरादाबाद में रहने वाले बदरुद्दीन सिद्दीकी के पास लेकर गए, जो कि क्रिकेट की कोचिंग देते थे।
- बदरुद्दीन की कोचिंग में शमी को काफी फायदा तो हुआ, लेकिन यूपी के छोटे से शहर में रहकर आगे बढ़ने के ज्यादा चांस नहीं थे। करीब सालभर बाद उनके पिता ने उन्हें अच्छी तैयारी के लिए कोलकाता भेज दिया।







शमी साल 2005 में करीब 16 साल की उम्र में क्रिकेटर बनने का सपना लेकर यूपी के एक छोटे से गांव से कोलकाता पहुंचे थे। जहां उन्होंने डलहौजी एथलेटिक्स क्लब से क्रिकेट खेलना शुरू किया।
- कोलकाता पहुंचने के बाद शुरुआती दिनों में शमी के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था, जिसके बाद कई बार उन्हें डलहौजी क्लब के अंदर लगे टेंट में रातें गुजारनी पड़ीं।
- हालांकि कुछ दिनों बाद थोड़ा पैसा मिलने के बाद वे वहां के बाकी क्रिकेटर्स के साथ रूम शेयर करके रहने लगे। उस वक्त डलहौजी के लिए एक मैच खेलने पर उन्हें 500 रुपए मिलते थे।






 शमी ने नवंबर 2013 में वेस्ट इंडीज के खिलाफ अपना डेब्यू टेस्ट मैच खेला था। सीरीज का ये पहला मैच था और सचिन तेंडुलकर के करियर का सेकंड लास्ट टेस्ट था।

- इस मैच की पहली ही इनिंग में शमी ने केवल 17 ओवर में 4 विकेट झटक लिए। इसके बाद दूसरी इनिंग में उन्होंने 13 ओवरों में 5 विकेट लेकर जबरदस्त डेब्यू किया था। भारत ने वो मैच एक इनिंग और 51 रन से जीता था।

- शमी अपने क्रिकेट करियर में अबतक 25 टेस्ट मैच खेलकर 86 विकेट ले चुके हैं। वहीं वनडे करियर में उन्होंने 49 मैचों में 91 विकेट लिए हैं। इसके अलावा 7 टी-20 मैचों में उनके नाम 8 विकेट दर्ज हैं।

- उन्होंने अपना डेब्यू वनडे मैच जनवरी 2013 में पाकिस्तान के खिलाफ खेला था, जिसमें उन्होंने 10 में से 4 ओवर मेडन डाले थे।

- शमी के अलावा उनके दो भाई और एक बहन भी हैं। उनके पिता का इसी साल जनवरी में निधन हो गया वहीं उनकी मां बेटे के साथ ही रहती हैं।









जून 2014 में शमी की शादी कोलकाता की ही रहने वाली हसीन जहां के साथ हुई है। इस कपल की एक बेटी आयरा है। जिसका जन्म जून 2015 में हुआ।




शमी बचपन से ही फास्ट बॉलर रहे हैं, अपनी रफ्तार के कारण ही काफी कम उम्र में वे आसपास के गांवों में फेमस हो गए थे।










जून 2014 में शमी की शादी कोलकाता की ही रहने वाली हसीन जहां के साथ हुई है। इस कपल की एक बेटी आयरा है।





 शमी के दो भाई और एक छोटी बहन भी है। उनके दोनों भाई भी क्रिकेटर रहे हैं। हालांकि बड़े भाई को बीमारी की वजह से बाद में पिता का बिजनेस संभालना पड़ा।




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Tuesday, May 8, 2018

क्‍यों मिल कर भी नहीं मिलता इन महासागरों का पानी, संगम पर दिखते हैं दो रंग

क्‍यों मिल कर भी नहीं मिलता इन महासागरों का पानी, संगम पर दिखते हैं दो रंग



अंतरराष्‍ट्रीय सीमा पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर मिलते हैं तो दोनों घुलमिल कर अपना वजूद नहीं खोते बल्‍कि दो अलग रंगों में साफ अलग नजर आते हैं।






दो महासागरों में दो रंग का पानी 


हमारी धरती के 70% हिस्से पर पानी ही पानी मौजूद है और इसका अधिकांश हिस्‍सा 5 महासागरों की अपनी अनंत सीमाओं के साथ पूरी पृथ्‍वी पर मौजूद है।








इन महासागर की सीमाओं और छोर को देख पाना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं है, लेकिन दो महासागरों की सीमायें ऐसी है जो आपस में मिलते हुए बिल्कुल साफ नजर आती हैं।







इसकी वजह यह है कि उनका पानी आपस में मिलता नहीं बल्कि अलग अलग नजर आता है। यह नजारा देखकर दुनिया दंग है 





और कुछ लोग तो इसे चमत्कार मानते हैं। वैसे इसकी असली वजह कुछ अलग और काफी दिलचस्‍प है।

अनोखा है दो महासागरों का ये संगम

इस दुनिया में मौजूद सात अलग-अलग महाद्वीप और उनके बीच फैले 5 अनंत महासागर हमारी धरती को विविधता और खूबसूरती प्रदान करते हैं। यह बात शायद आप जानते होंगे कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अलास्का की खाड़ी में एक दूसरे से मिलते हैं, लेकिन क्‍या आपको यह मालूम है कि इन दोनों के मिलन का यह नजारा दुनिया में सबसे अनोखा है, 







क्योंकि इन दो महासागरों का पानी आपस में घुलता मिलता नहीं बल्‍कि बिल्कुल अलग अलग रंगों का नजर आता है। यहां से गुजरने वाले पानी के जहाजों से यह नजारा साफ दिखता है और हैरान कर देता है। हिंद और प्रशांत महासागर की इस सीमा पर पानी के दो अलग-अलग रंग साफ नजर आते हैं। एक ग्‍लेशियर से आने वाला हल्‍का नीला पानी तो दूसरा दूर समंदर से आने वाला गहरा नीला पानी, साथ ही इन दोनो के मिलन स्‍थल पर झाग की एक दीवार साफ नजर आती है। इस जगह की कुछ शानदार तस्वीरें बीते कुछ सालों में इंटरनेट पर खूब वायरल हुई हैं।




क्‍यों दिखता है पानी अलग अलग 


वास्‍तव में इन दोनों महासागरो का पानी एक दूसरे से बिल्कुल अलग दिखने के पीछे एक खास वजह है। इस वजह का रिश्‍ता पानी के घनत्व और उसके तापमान समेत कई बातों से जुड़ा हुआ है। इन दोनों महासागरो के दिखने वाले अलग-अलग पानी को लेकर वैज्ञानिकों द्वारा अब तक तमाम शोध किए गए हैं और अंत में वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि इस जगह पर खारे और मीठे पानी के अलग अलग घनत्व और उनमें मौजूद लवण और तापमान के अलग होने के कारण यह दोनों पानी आपस में पूरी तरह से मिल नहीं पाते। 











प्रशांत महासागर का पानी ग्‍लेशियर से आने के कारण हल्‍का नीला और नमक रहित होता है, जबकि हिंद महासागर का पानी काफी खारा होता है। समंदर की गहराई में भले ही दोनों महासागर का पानी पूरी तरह से तक मिल जाता हो लेकिन ऊपरी सतह पर इन दोनों के भिन्‍न घनत्‍व वाले पानी के टकराने से कुछ झाग पैदा होता रहता है और यह झाग पानी ऊपर सतह पर एक सीमारेखा की तरह नजर आता है। सूरज की रोशनी में खारे और मीठे पानी के अलग-अलग घनत्व के कारण दोनों पानी का रंग एक दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आता है।







कई और विचार भी रहते हैं चर्चा में

हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के इस मिलन स्थल पर पानी की दीवार और अलग अलग रंगों के पानी का यह नजारा वाकई दुनिया को चौंकाने वाला है। कई बार तमाम लोग इसे चमत्कार मानते हैं तो कुछ लोग इसे कुछ धार्मिक मान्यताओं से भी जोड़ते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और यह दोनों महासागर कहीं ना कहीं जाकर तो आपस में पूरी तरह मिल ही जाते हैं बस समुद्र की ऊपरी सतह पर अलग अलग घनत्‍व वाले पानी के टकराने से पैदा होने वाली दीवार दोनों महासागरों के अलग होने का अनोखा और विस्मयकारी नजारा पेश करती है।




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देखिए पूरी दुनिया को चौंकाने वाली दमदार कारें, कोई दागती है मिसाइल तो कोई छोड़ती है आग के गोले

देखिए पूरी दुनिया को चौंकाने वाली दमदार कारें, कोई दागती है मिसाइल तो कोई छोड़ती है आग के गोले



ऐसी कार आपने सिनेमाघर के फिल्मी पर्दे पर या फिर टीवी स्क्रीन पर या किसी फिल्म के पोस्टर में ही देखी होगी। लेकिन दोस्तों आज जो कार कलेक्शन हम आपको दिखाने जा रहे हैं वह बेहद खास है क्योंकि ये आपकी सोच के बिलकुल परे है। जी हां ठीक वैसे ही जैसे किसी एक्शन फिल्म में कोई सुपरकार....









असल दुनिया में ऐसी कार देखकर तो कोई भी भौचक्का रह जाएगा। जी हां, अगर आप इनकी खासियत जान लेंगे तो दांतों तले उंगली दबा लेंगे। 








ऑटोमेटिक कारों से भी एक कदम आगे चलनी वाली इन कारों में कोई हवा में उड़ती है, कोई मिसाइल दागती है तो कोई खतरनाक हथियार बन जाती है। 





क्या आपने कभी सोचा है कि इन कारों के बिना सुपरहीरोज का क्या होता? असल जिंदगी में ये सुपरकारें हमें देखने को मिल सकती हैं चलिए बतातें है आपको इन दिलचस्प कारों के बारे में...





आयरन मैन फिल्म में इस्तेमाल की गई अकूरा 'एनएसएक्स' कार के बारे में आपने सुना नहीं होगा।यह कार पलभर में हवा से बातें करती है।इसी अंदाज में इस कार को फिल्म मे दिखाया गया है।बेहद खूबसूरत दिखने वाली इस कार ने वाकयी फिल्म के कई एक्शन सीन्स में जान डाली है।







रियल लाइफ में तो हम उड़ने वाली कारों के बेहद करीब पहुंच चुके हैं, कई कंपनियां 2019 में इन्हें बाजार में लॉन्च करने की बात भी कर चुकी हैं, यहां तक की कई टैक्सी कंपनियां अपने ग्राहकों को उड़ने वाली कारों की सर्विस प्रोवाइड कराने की बातें कह चुकी हैं। बता दें कि उड़ने वाली कार का कंसेप्ट पहले फिल्मों तक ही सीमित था। एजेंट अॉफ शील्ड नाम की हॉलीवुड मूवी में दिखाई गई फ्लाइंग कार के लोग फैन थे।फिल्म में दिखाया गया कि इंटेलीजेंस के लोग लाल रंग की उड़ने वाली कॉर्वेट कार का इस्तेमाल करते हैं, जो उड़ने के साथ-साथ कई तरह के हथियारों से लैस रहती है। इस कार की खासियत है कि ये आग भी उगलती है।




आपने हॉलीवुड की ट्रांसफॉमर्स मूवी की ट्रांसफॉर्मिंग कार तो देखी ही होगी, जी हां हम उस ही कार की बात कर रहे हैं जो चार पहियों पर चलते-चलते अचानक रोबोट की तरह दो पैरों पर खड़े होकर दौैड़ना शुरू कर देती है। ऐसी है कार है 'Transformers Transforming Car'। यह कार खासकर बच्चों को पसंद है।










लगभग 30-40 साल पहले ये सुपर कार केवल फिक्शन फिल्मों में दिखाई जाती थी। उस समय लोगों को इन्हें देखकर हंसी आती थी। वे यही मानकर चलते थे कि ऐसा असलियत में कभी नहीं हो सकता। लेकिन साइंस ने रियल लाइफ में उड़ने वाली कार लाकर ये साबित कर दिया कि सुपर हीरोज द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कारों को असली में बनाया जा सकता है।







ऐसे ही गोले और आग दागने वाली कार भी है जो दुश्मनों का सामना करने के लिए हथियारों से लैस है। सिर्फ इतना ही नहीं यह बुलटप्रूफ और सुपरफास्ट कारों में से एक है। ऐसी ही कार बैटमैन मूवी मे देखी जा सकती है जिसे फिल्म का हीरो इस्तेमाल करता है। इस कार में बैटमैन की जरूरत की हर चीज रहती है। इसकी खासियत है कि ये कन्वर्ट होकर बाइक में भी तब्दील हो सकती है।

 



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न लाल किला बिका है, न ही बिकेगा ताज, अफवाहों पर न दें ध्यान

न लाल किला बिका है, न ही बिकेगा ताज, अफवाहों पर न दें ध्यान



बीते शनिवार को इस खबर के आने के थोड़ी देर बाद ही तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने कह दिया लाल किले को प्राइवेट हाथों में बेचा जाना ठीक नहीं है. लेकिन कम लोगों को पता है डेरेक ओ ब्रायन ने शुरुआती चरण में एडॉप्ट अ हेरिटेज स्कीम की तारीफ की थी. पिछले साल ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म और कल्चर पर बनी स्टैंडिंग कमेटी के हेड के तौर पर उन्होंने कहा था ये सरकार का स्वागत योग्य कदम है. सिर्फ इतना ही नहीं कमेटी की रिपोर्ट नंबर 59 में ये भी लिखा था कि सरकार को कॉरपोरेट हाउसेज पर दबाव डालना चाहिए कि वो किसी राष्ट्रीय धरोहर को जरूर गोद लें. लेकिन अब डेरेक ओ ब्रायन कह रहे हैं लाक किले को ‘बेचा’ जाना गलत है. और ये बेचा जाना वही है जिसकी उन्होंने वकालत की थी. मजेदार ये है कि जिस स्कीम की तब डेरेक ने तारीफ की थी उसमें कोई भी परिवर्तन सरकार द्वारा नहीं किया गया है.









करीब 8 महीने पहले केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा एक स्कीम लॉन्च की गई जिसका नाम था 'अडॉप्ट अ हेरिटेज' स्कीम. इस स्कीम के तहत देशभर के 100 ऐसे ऐतिहासिक स्थानों को चिह्नित किया गया जिसे किसी के द्वारा रखरखाव के लिए अडॉप्ट किया जाए. इस प्रक्रिया में कोई भी शरीक हो सकता है. इसके लिए सरकार की तरफ से ‘मॉन्यूमेंट मित्र’ का नाम लिया गया. इस लिस्ट में न केवल लाल किला और ताज महल बल्कि फतेहपुर सीकरी आगरा और कोणार्क का सूर्य मंदिर जैसे न जाने कितने धरोहर शामिल हैं.








लाल किले के बिकने की खबर पर हो हल्ला मचने के बाद पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने स्पष्ट बयान दिया, ‘मुझे नहीं पता ये आंकड़ा कहां से आया, क्योंकि पूरे समझौते में पैसों की कोई बात है ही नहीं. 25 करोड़ तो दूर की बात है, 25 रुपये क्या इसमें 5 रुपये तक की भी बात नहीं है. न कंपनी सरकार को पैसे देगी न ही सरकार कंपनी को कुछ दे रही है. जैसे पहले पुरातत्व विभाग टिकट देता था व्यवस्था वैसी ही रहेगी और बस पर्यटकों के लिए सुविधाएं बढ़ जाएंगी.’







पर्यटन मंत्रालय की तरफ से मीडिया में चल रही खबरों पर विज्ञप्ति भी जारी की गई. उसमें लिखा गया कि जो एमओयू साइन हुआ वो सिर्फ विकास कार्यों, लाल किले के इर्द गिर्द सुविधाएं बढ़ाने के लिए हुआ है. इसमें मॉन्यूमेंट के हैंड ओवर जैसी कोई बात ही नहीं है.

संभव है कि सरकारी तंत्र की तरफ से कुछ बातें इसके लिए गढ़ी जा रही हों लेकिन जब हमने इसके एडॉप्ट ए हेरिटेज स्कीम की वेबसाइट खंगाली तो वहां पर लीज पर देने या बेचने जैसी कोई बात सामने नहीं आई. इसके लिए इस स्कीम की गाइडलाइंस देखी जा सकती हैं. इसके भीतर सारे प्रावधान रखरखाव से संबंधित ही हैं. हां कंपनी को अपने प्रचार के लिए अपने ऐड लगाने की अनुमति जरूर नियमों में वर्णित है.







इस खबर के प्रकाशित होने के साथ ही ऐसा प्रदर्शित किया गया कि देश में ऐसा पहली बार हो रहा है और लोकतांत्रिक मूल्यों के किले ढहने शुरू हो गए. लेकिन ऐसा नहीं है कि इस तरह की कोई स्कीम पहली बार मोदी सरकार में ही आई है.


वेबसाइट स्क्रॉल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक 2007 में महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एडॉप्ट अ मॉन्यूमेंट स्कीम के तहत प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को पांच साल के ऐतिहासिक धरोहरों को गोद लेने की स्कीम शुरू की थी. बाद में 2014 में जब पृथ्वीराज चव्हाण राज्य के मुख्यमंत्री थे तब इस स्कीम को बढ़ाकर कांग्रेस की ही सरकार ने दस साल के लिए कर दिया था. इसका कारण था कि कंपनियों की तरफ से ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया गया.













इस स्कीम के तहत महाराष्ट्र के ओस्मानाबाद जिले के नालदुर्ग किले को यूनी मल्टीकॉन्स कंपनी ने अडॉप्ट किया था. इसके एवज में कंपनी को सरकार की तरफ से इस किले के नजदीक एक जमीन का एक टुकड़ा भी उपलब्ध कराया गया था जिस पर वह सैलानियों के रेजॉर्ट तैयार कर सके. कंपनी ने किले को बेहतर बनाने के लिए काम भी किए हैं जिनमें किले की सफाई, लॉन और सड़कों के काम शामिल हैं.





लेकिन अगर आप इस वक्त कांग्रेस के विरोध को सुनें तो वो बिल्कुल उल्टे प्रतीत होते हैं. केंद्र सरकार पर देश की धरोहर गिरवी रखने तक के आरोप लगा रहे हैं. विपक्ष का सरकार को आड़े हाथों लेना लोकतंत्र की सांसें चलते रहने के लिए बेहद जरूरी है लेकिन ऐसी आलोचना! जहां केंद्र में आपकी सरकार रहते आपकी ही पार्टी के एक मुख्यमंत्री ने वर्षों तक ये योजना चलाई?


यही नहीं 27 फरवरी 2014 को जब यूपीए सरकार के आखिरी दिन चल रहे थे तब कॉरपोरेट मामलों के मंत्री सचिन पायलट के मंत्रालय से जारी विज्ञप्ति को देखिए. इस विज्ञप्ति में कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रेस्पॉन्सिबिटी कार्यक्रम के नियम तय किए गए हैं. इस विज्ञप्ति की हेडिंग में यह भी लिखा गया है कि ये काफी मशक्कत के बाद तैयार किया गया है. क्या इसके नियम नंबर (e) में राष्ट्रीय धरोहरों के जीर्णोद्धार और रखरखाव की बात नहीं है?











और जब ऐसा है तो कांग्रेस और डेरेक ओ ब्रायन जैसे नेता किसको बरगलाना चाहते हैं? क्या ये लोग सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं? क्या अगर 2014 में एनडीए की बजाए एक बार फिर यूपीए की ही सरकार होती तो क्या सीएसआर नियम लागू नहीं होते? और क्यों न होते उनकी ही पार्टी के शासन वाले एक राज्य में आखिर ये स्कीम 7 सालों से चल रही थी.

यही नहीं यूपीए सरकार के दौरान ही 2013 में ओएनजीसी ने ताज महल को गोद लिया था. इसके अलावा ओएनजीसी द्वारा अजंता और एलोरा, हैदराबाद का गोलकोंडा किला, तमिलनाडु का महाबलिपुरम और सबसे अहम दिल्ली का लाल किला गोद लेने की योजना थी. जी हां, दिल्ली का लाल किला जिस पर फिलवक्त कांग्रेस पार्टी बेहद दुखी है.






दरअसल राष्ट्रीय धरोहरों के संरक्षण और रखरखाव में प्राइवेट प्लेयर्स और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों के लिए दरवाजे खुलने का मामला 1996 में बनी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से शुरू होता है. जब कल्चर मिनिस्ट्री नेशनल कल्चरल फंड की स्थापना की थी. इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रीय धरोहरों की देखभाल के लिए पीपीपी मॉडल स्थापित करने का था. इसके लिए लिए चैरिटेबल एंडाउमेंट्स एक्ट, 1890 के तहत कंपनियों को कर में छूट देने की बात शामिल की गई.

इस बात को 22 साल बीत गए इस बीच न एनडीए और न ही यूपीए दोनों को ही इससे कोई परेशानी नहीं रही. 10 साल के यूपीए सरकार के दौरान सरकार और प्राइवेट शक्तियों के बीच कई एमओयू साइन हुए लेकिन कभी कोई हल्ला नहीं मचा.


 



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धोनी आखिर क्यों हैं क्रिकेट के सुपर कैप्टन

धोनी आखिर क्यों हैं क्रिकेट के सुपर कैप्टन



'अनहोनी को होनी कर दे जब खेल रहा हो धोनी।' यह जुमला अब इतनी बार सच साबित हुआ है कि अगर एमएसडी क्रीज पर हो तो हारने का तो सवाल ही नहीं होता। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्रसिंह धोनी निर्विवाद तौर पर भारत के सर्वश्रेष्ठ मैच फिनिशर में सबसे ऊपर खड़े नजर आते हैं।








इस बार आईपीएल के 11वें सीजन में 'माही फिर से मार रहा है' और इस कदर मार रहा है कि सामने वाली टीम के 200 रन भी कम काम पड़ रहे हैं।







अपने चिरपरिचित अंदाज में जब धोनी फिनिशिंग सिक्स लगाते हैं तो करोड़ों दिलों में उत्साह अपने चरम पर होता है, आप किसी भी टीम के समर्थक हो सकते हैं, लेकिन धोनी को धमाल मचाते देखने ही कुछ और है।






जब वे गगनचुंबी छक्के लगाते हैं तो आप खुद को उनके साथ जोड़ लेते हैं। छक्का लगाकर जीतना जहां धोनी की आदत बन चुकी है, वहीं धोनी भक्तों को भी इससे कम कुछ मजूंर नहीं।






चेन्नई सुपरकिंग्स की पीली जर्सी में चमकते एमएस धोनी जब खेलने उतरते हैं तो सामने कोई भी टीम हो, समर्थन धोनी को ही मिलता लगता है, मुंबई में पहले मैच में ही जब धोनी खेलने उतरे तो पूरे स्टेडियम में एक ही नाम गूंज रहा था- धोनी, धोनी, धोनी। और क्यों न गूंजे ये वे कप्तान हैं जिन्होंने भारतीय टीम के वे ख़्वाब सच कर दिखाए हैं, जो क्रिकेट के भगवान भी नहीं कर सके थे।











इसी शख्स ने सचिन तेंदुलकर को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में टीम इंडिया के कंधो पर बैठकर दुनिया के सामने क्रिकेट के महाकुंभ का खिताब जीत तिरंगा लहराने का 'हक' दिया था।







और जब स्थिति उनके मुताबिक़ नहीं रही तो उन्होंने बिना कुछ कहे-सुने कप्तानी को कह दिया गुडबॉय, कैप्टन कूल की इसी चौंकाने वाली अदा पर भी लाखों फ़िदा हैं। धोनी ने हमेशा सही समय पर सही काम कर दिखाया। उनके निर्णय क्रिकेट के बड़े-बड़े पंडितों के लिए बाउंसर रहे और उनके आलोचकों को हमेशा उन्होंने अपने बल्ले या सुपर कूल स्माइल जवाब देने वाले ने अपनी मर्जी से कप्तानी को राइट टाइम डिसीजन लेकर विदा कह दिया।










वैसे अधिकतर क्रिकेट कप्तान अपनी टीमों से लगभग हकाले गए हैं, वहीं धोनी के टेस्ट टीम से लिए संन्यास जैसे निर्णय अक्सर चौंकाने वाले ही रहे है। कुछ उन्हें किस्मत का धनी मानते हैं तो कुछ उन्हें टीम इंडिया का लकी चार्म मानते हैं और क्यों न हो रांची के इस साधारण से छोकरे ने अपनी काबिलियत से दो बार क्रिकेट की दुनिया पर फतह हासिल की है।







 हां, पिछले सीजन में पुणे से खेलते हुए उनका चिरपरिचित अंदाज नदारद रहा और टीम मैनेजमेंट और उनके मनमुटाव की खबरें भी आती रहीं, पर उन्होंने कभी खुद इस मामले पर कुछ नहीं कहा। उनका कूल अंदाज हर समय उनके साथ रहा और सबसे बड़ी बात अपने आलोचकों को अपने सुपर परफॉर्मेंस से लगातार चुप कराने वाला माही अभी भी मार रहा है वो भी जमकर।

 




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